एनईपी 2020 शिक्षा को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का ऐतिहासिक अवसर — प्रो॰ राम पाल सैनी

November 21, 2025

चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान प्रणाली पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला सम्पन्न

एनईपी–2020 के अनुरूप भारतीय ज्ञान–परंपरा के समग्र एकीकरण पर हुआ गहन अकादमिक विमर्श

चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय, जीन्द के एनईपी प्रकोष्ठ द्वारा ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’ विषय पर एक महत्त्वपूर्ण एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का भव्य एवं सफल आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में नई शिक्षा नीति—2020 के अंतर्गत भारतीय ज्ञान परंपरा को वैज्ञानिक पद्धति से वर्तमान शिक्षा–पाठ्यक्रम में समाहित करने की प्रक्रियाओं, संभावनाओं और रणनीतियों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई।

कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राम पाल सैनी ने की, जबकि गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के स्कूल ऑफ आई॰सी॰टी॰ के अधिष्ठाता प्रो॰ संजय कुमार शर्मा मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे।

कुलगुरू प्रो॰ रामपाल सैनी ने मुख्य वक्ता प्रो॰ संजय कुमार शर्मा को भारतीय परंपरा के प्रतीक के रूप में शॉल भेंट कर सम्मानित किया, जिससे कार्यशाला का शुभारंभ गरिमामय वातावरण में हुआ।

कुलगुरू प्रो॰ रामपाल सैनी ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि नई शिक्षा नीति—2020 भारतीय शिक्षा व्यवस्था को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप बनाने के साथ-साथ उसे भारत की सांस्कृतिक जड़ों, बौद्धिक परंपराओं और मानव–केंद्रित ज्ञान–सम्पदा से जोड़ने की ऐतिहासिक पहल है। उन्होंने स्पष्ट कहा— “हमारा लक्ष्य छात्रों को केवल रोजगारपरक शिक्षा तक सीमित न रखकर उन्हें जिज्ञासु, नवाचारी, समग्र सोच वाले और सांस्कृतिक रूप से जागरूक वैश्विक नागरिक बनाना है।” उन्होंने आश्वस्त किया कि विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान प्रणाली के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए पाठ्यक्रम, शिक्षण–प्रशिक्षण और शोध गतिविधियों को नई दिशा देने के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध है।

मुख्य वक्ता प्रो॰ संजय कुमार शर्मा ने भारतीय ज्ञान प्रणाली की ऐतिहासिक गहराई, वैज्ञानिकता और समकालीन प्रासंगिकता पर अत्यंत सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा गणित, खगोल विज्ञान, दर्शन, चिकित्सा, राजनीति, कृषि, योग और भाषा–विज्ञान जैसे क्षेत्रों में विश्व को दिशा प्रदान करती रही है। उन्होंने चरक, सुश्रुत, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, वात्स्यायन और पाणिनि जैसी महान परम्पराओं का उल्लेख करते हुए बताया कि भारतीय ज्ञान आज भी आधुनिक अनुसंधान और तकनीकी विकास के कई आधारों को मजबूत करता है। उन्होंने कहा— “भारतीय ज्ञान प्रणाली का उद्देश्य अतीत का महिमा–मंडन नहीं, बल्कि परंपरा को वैज्ञानिक कसौटियों पर परखकर वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्जीवित करना है।” साथ ही, डिजिटल संसाधनों, आधुनिक प्रौद्योगिकी, राज्य–स्तरीय सांस्कृतिक आदान–प्रदान कार्यक्रमों और कौशल–आधारित शिक्षण–प्रक्रियाओं के माध्यम से इस ज्ञान को विद्यार्थियों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुँचाने पर भी विस्तृत चर्चा हुई।

इस कार्यशाला में विश्वविद्यालय से सम्बद्ध सभी महाविद्यालयों के 23 से भी अधिक अलग-अलग विषयों के प्राध्यापक उपस्थित रहे। विभिन्न सत्र—जिनमें प्रस्तुतीकरण, संवाद, समूह–चर्चाएँ और प्रश्नोत्तर शामिल थे—अत्यंत ज्ञानवर्धक, सहभागितापूर्ण और शोध–उन्मुख सिद्ध हुए। प्रतिभागियों ने पाठ्यक्रम निर्माण, मूल्यांकन पद्धतियों, शिक्षण–मॉडलों और शोध–संभावनाओं पर अपने विचार साझा किए।

मंच संचालन का दायित्व डॉ॰ अरुण कुमार ने संभाला, जिन्होंने अपने प्रभावी, सुरुचिपूर्ण और ऊर्जावान संचालन से पूरे कार्यक्रम में विशेष जीवन्तता और ऊर्जा भर दी। उन्होंने वक्ताओं, प्रतिभागियों और विभिन्न सत्रों को जिस सौम्यता, दक्षता और संवाद–कुशलता से जोड़ा, उसने सभी उपस्थित जनों पर गहरा प्रभाव छोड़ा।

कार्यक्रम के समापन पर सभी प्रतिभागियों को प्रमाण–पत्र प्रदान किए गए तथा विश्वविद्यालय की ओर से जलपान की व्यवस्था की गई। प्रतिभागियों ने इस सुव्यवस्थित आयोजन और ज्ञानवर्धक सत्रों के लिए एनईपी प्रकोष्ठ एवं विश्वविद्यालय प्रशासन का आभार व्यक्त किया।