स्वतंत्रता संग्राम के महानायक भगवान बिरसा मुण्डा भारत के गौरव का प्रतिक- कुलपति प्रो॰ राम पाल सैनी
हिन्दी विभाग, सीआरएसयू में जनजातीय गौरव दिवस का भव्य आयोजन
धरती आबा बिरसा मुण्डा की 150वीं जयंती पर श्रद्धांजलि, संस्कृति और संघर्ष की गूँज
चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय, जीन्द के हिन्दी विभाग में आज जनजातीय अस्मिता, संस्कृति और स्वाभिमान के प्रतीक धरती आबा भगवान बिरसा मुण्डा की 150वीं जयंती के अवसर पर ‘जनजातीय गौरव दिवस’ अत्यंत गरिमामय और भव्य रूप में मनाया गया। कार्यक्रम की शुरुआत आदिवासी कवि हरिराम मीणा की प्रतिरोध से भरी पंक्तियों से हुई—
“मैं केवल देह नहीं/ मैं जंगल का पुश्तैनी दावेदार हूँ/ पुश्तें और उनके दावे मरते नहीं/ मैं भी मर नहीं सकता/ मुझे कोई भी जंगलों से बेदखल नहीं कर सकता— उलगुलान! उलगुलान! उलगुलान!”
इन पंक्तियों ने पूरे सभागार को आदिवासी आत्मसम्मान और बिरसा मुण्डा के ‘उलगुलान’ की ऐतिहासिक चेतना से भर दिया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं कुलपति प्रो॰ (डॉ॰) राम पाल सैनी ने अपने प्रेरक संबोधन में कहा कि भगवान बिरसा मुण्डा भारतीय जनजातीय अस्मिता के अमर प्रतीक हैं, जिन्होंने जल-जंगल-जमीन और सांस्कृतिक स्वाधिकारों की रक्षा के लिए असाधारण साहस के साथ संघर्ष किया।
उन्होंने कहा—“बिरसा मुण्डा का ‘उलगुलान’ आंदोलन केवल औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध नहीं था, बल्कि यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामाजिक न्याय का भी अद्भुत अध्याय है। आधुनिक पीढ़ी को उनके जीवन से राष्ट्रप्रेम, समानता और न्याय जैसे मूल्यों को आत्मसात करना चाहिए।”
कुलपति ने छात्रों से आह्वान किया कि वे भारतीय सांस्कृतिक बहुलता और आदिवासी परंपराओं को समझने और संरक्षित रखने में सक्रिय भूमिका निभाएँ।
कार्यक्रम के प्रथम मुख्य वक्ता प्रो॰ (डॉ॰) अशोक कुमार, अध्यक्ष—हिन्दी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़, ने कहा—“बिरसा मुण्डा का संघर्ष एक राजनीतिक प्रतिकार भर नहीं, बल्कि जनजातीय सांस्कृतिक अस्मिता को पुनर्जीवित करने वाला महान आंदोलन था। ‘उलगुलान’ ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ें हिलाकर रख दीं और आदिवासी समाज में चेतना की नई लहर जगाई।”
दूसरे मुख्य वक्ता, डॉ॰ कामराज सिन्धु (हरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय) ने कहा—“बिरसा मुण्डा का व्यक्तित्व आदिवासी समाज की सामूहिक चेतना, संघर्ष और संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। उनका बलिदान न केवल जनजातीय स्वतंत्रता चेतना का प्रतीक है, बल्कि भारतीय इतिहास की उन गाथाओं में से है जो सदियों तक प्रेरणा देती रहेंगी।”
कार्यक्रम में वक्ताओं ने बताया कि अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध बिरसा मुण्डा ने ऐतिहासिक ‘उलगुलान’— महान विद्रोह—का नेतृत्व किया। भूमि-अधिकार, सांस्कृतिक स्वायत्तता और जल-जंगल-जमीन की रक्षा हेतु यह आंदोलन जनजातीय इतिहास की धुरी बन गया।
मात्र 25 वर्ष की आयु में शहीद हो जाने के बावजूद बिरसा मुण्डा का संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अमर अध्याय बन गया। झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिशा और बंगाल के जनजातीय क्षेत्रों में आज भी उन्हें ‘धरती आबा’ के रूप में पूजा जाता है।
वर्ष 2021 से भारत सरकार ने उनकी जयंती को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में स्वीकृत किया है।
हिन्दी विभाग की छात्राओं ने आदिवासी कविताओं, गीतों और सांस्कृतिक अंशों पर आधारित अत्यंत संवेदनापूर्ण प्रस्तुति दी। उनकी प्रस्तुति में जनजातीय जीवन की अस्मिता, प्रकृति-आस्था, सामुदायिक एकता और संघर्ष की गहरी झलक दिखाई दी। यह प्रस्तुति कार्यक्रम की विशेष आकर्षण रही, जिसने पूरे सभागार में आदिवासी संस्कृति की जीवंत अनुभूति कराई।
कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों ने बिरसा मुण्डा के आदर्शों—साहस, स्वाभिमान, न्याय और सांस्कृतिक गौरव—को आत्मसात करने का संकल्प दोहराया।
कार्यक्रम में हिंदी विभाग के साथ साथ अन्य विभाग के विद्यार्थी और शिक्षक भी शामिल रहें।
