जनजातीय संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण पर सीआरएसयू का विशेष अध्ययन- कुलगुरु प्रो. राम पाल सैनी

February 18, 2026

चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय, जींद के माननीय कुलगुरु प्रो. राम पाल सैनी के कुशल नेतृत्व, दूरदर्शी मार्गदर्शन एवं सतत प्रेरणा के अंतर्गत भूगोल विभाग द्वारा जबलपुर जिला, मध्य प्रदेश की बैगा तथा गोंड बहुल क्षेत्रों में एक विस्तृत शैक्षणिक क्षेत्रीय अध्ययन (फील्ड सर्वे) का सफल आयोजन किया गया।

इस अध्ययन में विभाग के 48 विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। यह अध्ययन विद्यार्थियों के लिए केवल एक शैक्षणिक भ्रमण नहीं था, बल्कि जमीनी स्तर पर समाज, संस्कृति और पर्यावरण को समझने का एक सशक्त अवसर सिद्ध हुआ।

क्षेत्रीय अध्ययन के समापन उपरांत विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राम पाल सैनी ने विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को इस सफल आयोजन के लिए हार्दिक बधाई दी। उन्होंने कहा, “ऐसे क्षेत्रीय अध्ययन विद्यार्थियों को पुस्तक आधारित ज्ञान से आगे बढ़ाकर वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से परिचित कराते हैं। जनजातीय समाज के जीवन, उनकी समस्याओं और उनके पारंपरिक ज्ञान को समझना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यही हमारे देश की सांस्कृतिक विविधता और पर्यावरणीय संतुलन की आधारशिला है।”

उन्होंने कहा, “भूगोल केवल मानचित्रों और सिद्धांतों तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि यह समाज, प्रकृति और मानव के पारस्परिक संबंधों को समझने का विज्ञान है। मुझे प्रसन्नता है कि हमारे विद्यार्थी जमीनी स्तर पर शोध कर रहे हैं और समाज के वंचित वर्गों को समझने का प्रयास कर रहे हैं। भविष्य में भी इस प्रकार के शैक्षणिक भ्रमण और अनुसंधान कार्य निरंतर आयोजित किए जाएँगे, ताकि विद्यार्थियों का समग्र विकास सुनिश्चित हो सके।”

प्रो. सैनी ने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि वे अपने अनुभवों को शोध लेखों, परियोजनाओं और प्रस्तुतियों के माध्यम से साझा करें, जिससे समाज में जनजातीय जीवन और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़े। उन्होंने यह भी आशा व्यक्त की कि इस प्रकार के प्रयास विश्वविद्यालय की शैक्षणिक उत्कृष्टता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध होंगे।

अध्ययन के दौरान विद्यार्थियों ने गोंड जनजाति एवं बैगा जनजाति के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन का गहन अध्ययन किया। उन्होंने जनजातीय बस्तियों का भ्रमण कर उनकी आजीविका के साधनों, पारंपरिक कृषि पद्धतियों, आवास शैली, खान-पान, वेशभूषा, लोक-विश्वास, रीति-रिवाज तथा पारिवारिक संरचना का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। विद्यार्थियों ने यह भी जाना कि इन समुदायों की जीवनशैली प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को दर्शाती है।

विशेष रूप से बैगा जनजाति, जिसे भारत सरकार द्वारा संवेदनशील जनजातीय समूह (PVTG) का दर्जा प्राप्त है, सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से अत्यंत पिछड़ी मानी जाती है। यह जनजाति मुख्यतः दूरस्थ एवं घने वन क्षेत्रों में निवास करती है तथा वनों से प्राप्त संसाधनों पर ही अपनी आजीविका निर्भर करती है। विद्यार्थियों ने यह समझने का प्रयास किया कि किस प्रकार ये जनजातियाँ वन संपदा का संतुलित उपयोग करते हुए पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान प्रणाली, औषधीय पौधों की जानकारी तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की स्थानीय विधियों का भी अध्ययन किया।

अध्ययन के अंतर्गत कुछ विद्यार्थियों ने सतपुड़ा क्षेत्र में पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों का भौगोलिक एवं पारिस्थितिकीय अध्ययन भी किया। इस दौरान क्षेत्र की जैव विविधता, प्राकृतिक वनस्पति, स्थलाकृति तथा जलवायु संबंधी विशेषताओं का अवलोकन किया गया। पक्षी प्रजातियों की विविधता ने यह स्पष्ट किया कि सतपुड़ा क्षेत्र पर्यावरणीय संतुलन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अध्ययन से विद्यार्थियों को जैव विविधता संरक्षण की आवश्यकता एवं मानव-प्रकृति संबंधों की गहराई को समझने का अवसर मिला।

इस शैक्षणिक भ्रमण एवं शोध कार्य में डॉ. मंजीत सिंह, डॉ. देवेंद्र यादव, श्रीमती पूनम एवं श्री मनीष कुमार का विशेष मार्गदर्शन रहा। उन्होंने विद्यार्थियों को क्षेत्रीय अध्ययन की विधियों, आंकड़ों के संकलन, साक्षात्कार तकनीक तथा विश्लेषण की प्रक्रियाओं के बारे में मार्गदर्शन प्रदान किया, जिससे विद्यार्थियों का व्यावहारिक ज्ञान सुदृढ़ हुआ।