अनुसंधान एवं नवाचार से बनेगा विकसित भारत- प्रो. राम पाल सैनी चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय, जींद में “ज्ञान से संपदा”विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन
चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय, जींद में “ज्ञान से संपदा”विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन
चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय, जींद के डॉ. भीमराव आंबेडकर पुस्तकालय एवं आईपीआर सेल द्वारा संयुक्त रूप से “ज्ञान से संपदा: विकास में अनुसंधान एवं बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) की भूमिका” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया। इस कार्यशाला का उद्देश्य शोध, नवाचार एवं बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) के माध्यम से आर्थिक एवं सामाजिक विकास की संभावनाओं को प्रोत्साहित करना रहा।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राम पाल सैनी ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान युग ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था का है, जहां शोध और नवाचार ही राष्ट्र की प्रगति का आधार बनते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि वे अपने अनुसंधान को केवल अकादमिक सीमाओं तक न रखें, बल्कि उसे समाज और उद्योग से जोड़ते हुए व्यावहारिक रूप में परिवर्तित करें।
शैक्षणिक अधिष्ठाता और लाइब्रेरी इंचार्ज प्रो. विशाल वर्मा ने इस वर्कशॉप में पहुंचने पर सभी का फॉर्मल वेलकम किया और वर्कशॉप के मुख्य उद्देश्य से अवगत करवाया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. धनपत राम अग्रवाल, निदेशक, इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रेड, कोलकाता ने कहा कि आईपीआर आज के समय में आर्थिक सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण साधन है। उन्होंने पेटेंट, कॉपीराइट एवं ट्रेडमार्क के माध्यम से नवाचार को व्यावसायिक रूप देने पर जोर दिया और प्रतिभागियों को अपने शोध को पेटेंट कराने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने यह भी कहा कि “इनोवेशन तभी सार्थक है जब उसे समाज और उद्योग के उपयोग में लाया जाए,” तथा युवाओं को स्टार्टअप एवं उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान किया।
आज का युग ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, अनुसंधान और नवाचार का युग है, जो मानव विकास और समृद्धि की नींव है। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए यह जरूरी है कि हम अपनी वर्तमान स्थिति को समझें और कमियों को दूर करें। अनुसंधान केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित न रहकर उद्योगों और उद्यमियों तक पहुँचना चाहिए।इतिहास में पहले जीवन प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित था, लेकिन आज मानव संसाधन सबसे महत्वपूर्ण बन गया है। भारत के पास विश्व की लगभग 18% जनसंख्या है, जो इसकी सबसे बड़ी ताकत है, फिर भी हम इसका पूर्ण उपयोग नहीं कर पा रहे हैं और ब्रेन ड्रेन एक बड़ी चुनौती है।आर्थिक दृष्टि से भारत अभी अमेरिका और चीन से पीछे है, जिसका मुख्य कारण अनुसंधान और नवाचार में कम निवेश है। इसलिए हमें अपने आविष्कारों को बढ़ावा देने के साथ-साथ उन्हें बौद्धिक संपदा अधिकारों (पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क आदि) से सुरक्षित करना होगा।यदि भारत अपने मानव संसाधन का सही उपयोग करे, अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा दे और बौद्धिक संपदा को महत्व दे, तो आने वाले वर्षों में "विकसित भारत" का सपना साकार किया जा सकता है।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रो. राजबीर सिंह, कुलगुरु, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक ने अपने वक्तव्य में कहा कि विश्वविद्यालयों को शोध आधारित नवाचार का केंद्र बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान ही देश को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक सिद्ध होगा और आईपीआर के प्रति जागरूकता बढ़ाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि शैक्षणिक संस्थानों को उद्योगों के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए ताकि शोध का व्यावहारिक लाभ समाज तक पहुंच सके।
आज के ज्ञान-आधारित युग में स्टूडेंट्स की भूमिका केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि वे रिसर्च और नवाचार के माध्यम से नए विचारों को जन्म देकर बौद्धिक संपदा (IPR) का निर्माण कर सकते हैं। एक छात्र अपने रिसर्च को पेटेंट, कॉपीराइट या अन्य IPR के रूप में विकसित कर सकता है, जिससे न केवल उसकी व्यक्तिगत पहचान बनती है बल्कि देश की प्रगति में भी योगदान होता है।“विकसित भारत” के सपने को साकार करने के लिए आवश्यक है कि हम रिसर्च को जमीनी स्तर से मजबूत करें और छात्रों, संस्थानों तथा उद्योगों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करें। जब युवा अपने विचारों को नवाचार में बदलेंगे और उन्हें IPR के माध्यम से सुरक्षित करेंगे, तभी वास्तविक आत्मनिर्भरता और आर्थिक विकास संभव होगा।
नीतिगत स्तर पर भी बदलाव जरूरी हैं। इस संदर्भ में यह एक सकारात्मक पहल है कि हरियाणा सरकार ने पहली बार अपने बजट में रिसर्च के लिए अलग से प्रावधान किया है। यह दर्शाता है कि अब राज्य और देश दोनों स्तर पर रिसर्च और नवाचार को प्राथमिकता दी जा रही है, जो भविष्य में बड़े बदलाव का आधार बन सकता है।
अंत में धन्यवाद प्रस्ताव विश्वविद्यालय की कुलसचिव प्रो. सीमा गुप्ता द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसमें उन्होंने कार्यक्रम के सफल आयोजन हेतु सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्राध्यापकों एवं प्रतिभागियों का हार्दिक आभार व्यक्त किया। उन्होंने विशेष रूप से शैक्षणिक अधिष्ठाता और लाइब्रेरी इंचार्ज प्रो. विशाल वर्मा, डिप्टी लाइब्रेरियन डॉ. अनिल कुमार एवं उनकी पूरी टीम को इस प्रकार की ज्ञानवर्धक कार्यशाला के सफल आयोजन के लिए बधाई दी।
मंच का संचालन डॉ. रितु ने अत्यंत प्रभावी, सुव्यवस्थित और गरिमापूर्ण ढंग से किया, जिससे कार्यक्रम सुचारू रूप से संपन्न हुआ।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के प्राध्यापकगण, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। अंत में आयोजकों द्वारा सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया गया तथा भविष्य में इस प्रकार के और अधिक कार्यक्रम आयोजित करने का संकल्प लिया गया।
